मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

मेरी आदत नही गई



tumhare कपडो को छूकर उन्हें होठो से लगा rone ki meri adat nahi



गई ,तुम्हारी एक -एक चीजों को सहेजकर



उन्हें साफ़ करके सजाने की मेरी आदत नही गई ,



सिसकने की मेरी आदत नही गयी ।



तुम्हारे जाने के बाद लाख कोशिशो के बाद भी



तुम्हे याद करने की मेरी आदत नही गई ।



अगर छूट भी गई तो वह तुम्हारी उंगली पकड़कर चलने की आदत ,



आचल में सर छुपा मचलने की आदत ,



छुप -छुप कर तुम्हे नाराज करने की आदत



वह आदत जिससे तुम परेशां हो जाती थी और



मुझे पीटने के बाद ख़ुद रोने लगती थी



अगर गई भी तो थकी बेसुध सी तुम्हे पकड़कर सोने की आदत ।



लेकिन देर रात तक चाँद सितारों से तुम्हे मांग लाने की मेरी आदत नही गई।

किससे कहू और कैसे कहू माँ तनहा तुम्हे याद करने
मेरी आदत नही गई।






रविवार, 21 सितंबर 2008

प्रभा जी

प्रभा खेतान जी को मेरी भी पुष्पांजलि अर्पित .क्या करू sivay eske .